मंगलवार 8 सितंबर 2026 - 19:09
उफ़ुक़-ए-इल्म पर एक आफ़्ताब तुलूअ हुआ

ख़ामेनेई की विलादत-ए-बासआदत के मौक़े पर दिल की गहराइयों से तबरीक़ व तहनीअत पेश करते हैं; ऐसी मुबारकबाद जिसमें अल्फ़ाज़ से ज़्यादा अक़ीदत, इबारत से ज़्यादा इख़लास और रस्म से ज़्यादा दिल की आवाज़ शामिल है।

लेखक:सैय्यद हुसैन महदी अमसिन

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी ! कुछ तारीख़ें सिर्फ़ तारीख़ें नहीं होतीं, कुछ दिन महज़ दिन नहीं होते, और बाज़ विलादतें सिर्फ़ एक इंसान की आमद का एलान नहीं करतीं; बल्कि वो एक फ़िक्र के तुलूअ, एक किरदार के ज़ुहूर, एक अज़्म के इस्तेहकाम और एक नए सफ़र के आग़ाज़ की नवेद बनकर आती हैं।
८ सितंबर भी हमारे लिए ऐसा ही एक दिन है।
ये वो दिन है जब मशहद की सरज़मीन ने एक ऐसे फ़र्ज़ंद को अपनी आग़ोश में लिया, जिसकी ज़िंदगी का सफ़र इल्म व फ़क़ाहत की राहों से गुज़रता हुआ हौज़ा-ए-इल्मिया की इल्मी फ़ज़ाओं तक पहुँचा; जिसने दर्स व बहस, तहक़ीक़ व तदरीस और इल्मी रियाज़त के मराहिल तय किए और जिसकी ज़िंदगी में किताब व क़लम के साथ मैदान-ए-अमल की सदाएँ भी सुनाई दीं।
आज हम हज़रत आयतुल्लाहिल उज़्मा सय्यद मुज्तबा हुसैनी ख़ामेनेई की विलादत-ए-बासआदत के मौक़े पर दिल की गहराइयों से तबरीक़ व तहनीअत पेश करते हैं; ऐसी मुबारकबाद जिसमें अल्फ़ाज़ से ज़्यादा अक़ीदत, इबारत से ज़्यादा इख़लास और रस्म से ज़्यादा दिल की आवाज़ शामिल है।
इंसान की अज़मत सिर्फ़ इस बात से मुतअय्यन नहीं होती कि वो किस ख़ानदान में पैदा हुआ; अस्ल अज़मत उस वक़्त आशकार होती है जब इंसान अपने लिए कौन-सा रास्ता मुन्तख़ब करता है, किस मक्तब में तरबियत पाता है, किस इल्म से फ़ैज़याब होता है, किन आज़माइशों से गुज़रता है और वक़्त-ए-इंतिख़ाब में किस सफ़ में खड़ा होता है।
निस्बत इंसान को पहचान दे सकती है, मगर मक़ाम नहीं।
नाम ख़ानदान से मिल सकता है, मगर एहतराम किरदार से पैदा होता है।
मंसब अता किया जा सकता है, मगर एतमाद सिर्फ़ अमल से हासिल होता है।
इसीलिए किसी शख़्सियत को सिर्फ़ उसके नसब, नाम या मंसब से पढ़ना, दरअसल उस शख़्सियत के साथ भी नाइंसाफ़ी है और तारीख़ के साथ भी। शख़्सियत का अस्ल तआरुफ़ उसका सफ़र होता है; वो सफ़र जिसमें इंसान अपने आपको बनाता, सँवारता, आज़माता और बिलआख़िर अपने किरदार की गवाही ज़माने के सामने पेश करता है।
सय्यद मुज्तबा ख़ामेनेई की ज़िंदगी का एक नुमायाँ पहलू यही इल्मी व अमली इम्तिज़ाज है।
उन्होंने हौज़ा-ए-इल्मिया की राह इख़्तियार की, उलूम-ए-दीनिया से कस्ब-ए-फ़ैज़ किया, फ़िक़्ह व उसूल के दक़ीक़ व अमीक़ मबाहिस में सालहा-साल ग़ौर व ख़ौज़ किया, जईद असातिज़ा-ए-हौज़ा के सामने ज़ानू-ए-तलम्मुज़ तह किया और क़ुम की इल्मी फ़ज़ा में दर्स व बहस, तहक़ीक़ व तदरीस और उस्ताद व शागिर्द की उस दैरिना रिवायत से वाबस्ता रहे जिसने सदियों से शिया इल्मी तहज़ीब के चराग़ रौशन रखे हैं।
हौज़ा सिर्फ़ दर्सगाह नहीं।
हौज़ा एक तहज़ीब-ए-फ़िक्र है, एक तरबियत-ए-नज़र है, एक रियाज़त-ए-अक़्ल है।
वहाँ इल्म सिर्फ़ पढ़ा नहीं जाता, बरता जाता है; दलील सिर्फ़ सुनी नहीं जाती, परखी जाती है; सवाल सिर्फ़ उठाया नहीं जाता, उसकी तह तक पहुँचने की कोशिश की जाती है।
फ़िक़्ह सिर्फ़ मसाइल का मजमूआ नहीं; ये दीन के मिज़ाज को समझने का नाम है।
उसूल सिर्फ़ इस्तिलाहात की दुनिया नहीं; ये इस्तिदलाल की वो बुनियाद है जिस पर एक साहिब-ए-नज़र आलिम अपने फ़िक्री निज़ाम की तामीर करता है।
और इज्तिहाद महज़ एक इल्मी मर्तबा नहीं; ये बदलते हुए ज़माने के नए सवालात के सामने दीनी फ़िक्र की ज़िंदा क़ुव्वत का इज़हार है।
हौज़ा तालिब-ए-इल्म को सिर्फ़ ये नहीं सिखाता कि क्या सोचना है; वो ये भी सिखाता है कि कैसे सोचना है।
वो सिर्फ़ किताब नहीं देता, निगाह देता है।
सिर्फ़ इबारत नहीं देता, फ़हम देता है।
सिर्फ़ मालूमात नहीं देता, बसीरत पैदा करता है।
और जब इल्म ईमान से मिल जाए, ईमान बसीरत से, बसीरत अमल से और अमल इस्तिक़ामत से वाबस्ता हो जाए तो इंसान महज़ आलिम नहीं रहता; एक ऐसी शख़्सियत बनने की राह पर गामज़न हो जाता है जिसके लिए इल्म महज़ ज़ीनत नहीं, बल्कि ज़िम्मेदारी बन जाता है।
यही वो मक़ाम है जहाँ एक सवाल सामने आता है:
किताब ने इंसान को कितना बदला?
कितनी किताबें पढ़ी गईं, ये अपनी जगह अहम है; मगर उन किताबों ने किरदार में कितनी रौशनी पैदा की, अस्ल सवाल ये है।
कितने हवाले याद हैं, ये अपनी जगह; मगर उन हवालाें से बसीरत कितनी पैदा हुई, अस्ल अहमियत उसकी है।
क्योंकि इल्म अगर किरदार न बने तो किताबों का बोझ है, और किरदार अगर इल्म से ख़ाली हो तो जज़्बात का शोर।
कमाल वहाँ पैदा होता है जहाँ इल्म, ईमान बने; ईमान, बसीरत बने; बसीरत, अमल बने; और अमल, इस्तिक़ामत में ढल जाए।
जब किताब और मैदान एक-दूसरे से मिले
ज़िंदगी हमेशा एक ही रंग में नहीं रहती।
एक वक़्त वो होता है जब हाथ में किताब होती है, सामने उस्ताद होता है और ज़ेहन सवालों से उलझता है; फिर एक वक़्त ऐसा भी आता है जब हालात ख़ुद एक सवाल बनकर सामने खड़े हो जाते हैं और इंसान से उसके इल्म, ईमान और अज़्म का जवाब माँगते हैं।
सय्यद मुज्तबा ख़ामेनेई की ज़िंदगी में दिफ़ा-ए-मुक़द्दस के ज़माने में मैदान से वाबस्तगी इसी अमली मरहले की एक अहम कड़ी के तौर पर सामने आती है।
वही हाथ जो किताब के औराक़ पलटता है, वक़्त का तक़ाज़ा हो तो दिफ़ा के मैदान में भी उठ सकता है।
वही ज़बान जो दर्स व बहस में दलील पेश करती है, वक़्त-ए-हक़ में कलिमा-ए-हक़ भी बुलंद कर सकती है।
और वही दिल जो मेहराब में ख़ुदा के हुज़ूर झुकता है, अगर ज़िम्मेदारी की घड़ी आए तो फ़र्ज़ से मुँह नहीं मोड़ता।
यही इल्म का हुस्न है कि वो इंसान को ज़िम्मेदारी से फ़रार नहीं, ज़िम्मेदारी क़ुबूल करना सिखाता है।
किताब पढ़ने वाले बहुत हैं, किताब का हक़ अदा करने वाले कम।
गुफ़्तगू करने वाले बहुत हैं, अपनी गुफ़्तगू की क़ीमत अदा करने वाले कम।
दावा करने वाले बहुत हैं, आज़माइश की घड़ी में दावे को किरदार में ढालने वाले बहुत कम।
और तारीख़ हमेशा उन्हीं कम लोगों को याद रखती है जो लफ़्ज़ और अमल के दरमियान फ़ासले को मिटा देते हैं।
मक्तब-ए-अहले-बैत अलैहिमुस्सलाम की इल्मी रिवायत भी यही दर्स देती है कि आलिम सिर्फ़ वो नहीं जो बहुत कुछ जानता हो; आलिम वो है जो अपने ज़माने को पहचानता हो, हक़ व बातिल में इम्तियाज़ करता हो, फ़ितनों के हुजूम में बसीरत का चराग़ रौशन रखता हो और अपने इल्म को दीन व इंसानियत की ख़िदमत का ज़रिया बनाता हो।
इल्म अगर इंसान को ज़माने के दर्द से बेख़बर कर दे तो वो इल्म अधूरा है।
इबादत अगर इंसान को ज़िम्मेदारी से दूर कर दे तो वो इबादत अधूरी है।
और सियासत अगर अख़लाक़ व अदालत से जुदा हो जाए तो वो सियासत नहीं, महज़ इक़्तिदार की कशमकश रह जाती है।
कमाल तो वहाँ है जहाँ इल्म, ईमान, बसीरत, अख़लाक़ और ज़िम्मेदारी एक नुक्ते पर जमा हो जाएँ।
वहीं एक आलिम महज़ साहिब-ए-इल्म नहीं रहता; अपने ज़माने का अमीन बन जाता है।
रहबरी — मंसब नहीं, अमानत
अमानत हमेशा आसान नहीं होती।
जितना मंसब बुलंद होता है, ज़िम्मेदारी उतनी ही संगीन होती है।
जिसके हाथ में चराग़ हो, उससे रौशनी की उम्मीद भी ज़्यादा की जाती है।
जिसके कंधे पर परचम हो, उससे इस्तिक़ामत की तवक़्क़ो भी ज़्यादा होती है।
और जिसे रहबरी की ज़िम्मेदारी सौंपी जाए, उससे सिर्फ़ क़ुव्वत नहीं, बसीरत भी मतलूब होती है; सिर्फ़ शुजाअत नहीं, हिकमत भी; सिर्फ़ अज़्म नहीं, अद्ल व शफ़क़त भी।
रहबरी महज़ एक मंसब नहीं; ये अमानत है।
ये इख़्तियार से पहले जवाबदेही है।
ये इक़्तिदार से पहले मसऊलियत है।
रहबर के सामने सिर्फ़ आज का सवाल नहीं होता; उसे आने वाले कल की आहट भी सुननी होती है।
बोहरान में सुकून चाहिए, फ़ैसले में हिकमत, मुश्किल में इस्तिक़ामत, दुश्मन के मुक़ाबले में शुजाअत और अपने लोगों के साथ अद्ल व शफ़क़त।
कश्ती का नाख़ुदा साहिल पर नहीं पहचाना जाता; वो तूफ़ान में पहचाना जाता है।
जब मौजें बुलंद हों, रास्ते धुँधला जाएँ और निगाहें एक ही सिम्त उठें, तब मालूम होता है कि नाख़ुदा के हाथ में सिर्फ़ पतवार है या बसीरत भी।
इसीलिए बड़ी ज़िम्मेदारी के लिए इल्म के साथ तदब्बुर, क़ुव्वत के साथ अख़लाक़, अज़्म के साथ हिकमत और बसीरत के साथ एहसास-ए-ज़िम्मेदारी दरकार होता है।
आज ८ सितंबर को हम सिर्फ़ उम्र के एक और साल के इज़ाफ़े को याद नहीं कर रहे; हम एक ऐसे इल्मी व अमली सफ़र को सलाम पेश कर रहे हैं जिसमें मशहद की मिट्टी भी है, हौज़े की इल्मी फ़ज़ा भी, किताब व क़लम की रिफ़ाक़त भी और मैदान-ए-अमल का तजुर्बा भी।
हम उस हौज़वी रिवायत को सलाम पेश करते हैं जिसने सदियों से चराग़ से चराग़ जलाया है; जिसमें एक नस्ल अपना इल्मी सरमाया दूसरी नस्ल के हवाले करती है; जहाँ इल्म को महज़ ज़ीनत नहीं बल्कि अमानत समझा जाता है।
हम उस बसीरत को सलाम पेश करते हैं जो फ़ितनों के अंधेरों में रास्ता दिखाती है।
हम उस इस्तिक़ामत को सलाम पेश करते हैं जो तूफ़ानों के मुक़ाबिल चराग़ की तरह जलती रहती है।
और हम उस अज़्म को सलाम पेश करते हैं जो आसान रास्तों के बजाय ज़िम्मेदारी की दुश्वार राहों का इंतिख़ाब करता है।
पस आज ज़बान पर सिर्फ़ मुबारकबाद नहीं, एक दुआ भी है।
बारगाह-ए-ख़ुदावंदी में दस्त-ए-दुआ बुलंद है कि परवरदिगार-ए-आलम हज़रत आयतुल्लाहिल उज़्मा सय्यद मुज्तबा हुसैनी ख़ामेनेई के इल्म में वुसअत, फ़िक्र में गहराई, बसीरत में पुख़्तगी, इरादे में इस्तेहकाम और क़दमों में सुबात अता फ़रमाए।
हर आज़माइश में सब्र, हर मुश्किल में हिकमत, हर फ़ैसले में दूरअंदेशी और हर मरहले में नुसरत-ए-इलाही को उनका रफ़ीक़ व यावर बनाए।
ख़ुदा करे चराग़-ए-इल्म हमेशा फ़रोज़ाँ रहे, शम्अ-ए-बसीरत हमेशा ताबाँ रहे, अज़्म-ए-इस्तिक़ामत हमेशा पायदार रहे और ख़िदमत का ये सफ़र रोज़-ब-रोज़ रौशनतर, वसीअतर और बाबरकततर होता चला जाए।
उनकी हर सुबह गुज़िश्ता शब से ज़्यादा रौशन हो;
हर क़दम गुज़िश्ता क़दम से ज़्यादा मुस्तहकम हो;
हर कोशिश ख़ैर व सलाह का ज़रिया बने;
और ज़िंदगी का हर आने वाला बाब इल्म से रौशन, अमल से मुज़य्यन, बसीरत से मुनव्वर और तौफ़ीक़-ए-इलाही से मामूर हो।

८ सितंबर मुबारक हो!

ये दिन मुबारक, ये साअत मुबारक, ये निस्बत मुबारक।
इल्म मुबारक, अमल मुबारक;
अज़्म मुबारक, बसीरत मुबारक;
क़लम मुबारक, क़दम मुबारक;
और ख़िदमत-ए-दीन व इंसानियत का ये सफ़र भी मुबारक।
हम अपनी तमामतर अक़ीदत, मोहब्बत और इख़लास के साथ हज़रत आयतुल्लाहिल उज़्मा सय्यद मुज्तबा हुसैनी ख़ामेनेई को सालरोज़-ए-विलादत-ए-बासआदत की साइमाना मुबारकबाद पेश करते हैं।
दुआ है कि आने वाले साल इल्म की नई रौशनियाँ, ख़िदमत के नए मौक़े, बसीरत की नई वुसअत और ख़ैर व बरकत के नए दरवाज़े लेकर आएँ।
और जब आने वाली नस्लें इस अहद के औराक़ पलटें तो उन्हें सिर्फ़ एक तारीख़ न मिले; उन्हें एक ऐसा सफ़र दिखाई दे जिसमें हौज़ा भी था और मैदान भी, क़लम भी था और क़दम भी, इल्म भी था और अमल भी, अज़्म भी था और बसीरत भी।
शायद किसी विलादत की इससे बड़ी सआदत क्या होगी कि साल गुज़रते जाएँ, मौसम बदलते जाएँ, ज़माना करवटें लेता रहे, मगर इस ज़िंदगी के मआनी वक़्त के साथ मद्धिम न हों; बल्कि हर आने वाली नस्ल उनमें अपने लिए इल्म की एक किरन, बसीरत की एक राह और अमल की एक दावत तलाश करती रहे।

ख़ुदा करे ८ सितंबर महज़ तक़वीम की एक तारीख़ न रहे; बल्कि इल्म, बसीरत, अज़्म और इस्तिक़ामत की एक रौशन अलामत बन जाए।

विलादत-ए-बासआदत मुबारकबाद!

वस्सलामु अलैकुम व रहमतुल्लाहि व बरकातुह

टैग्स

आपकी टिप्पणी

You are replying to: .
captcha